इंतज़ार से गुज़रा हूं इज़्तिरार से गुज़रा हूं,
उल्फत की राह में हर एहसास से गुज़रा हूं।
लौटा ना कभी जो भी एक बार गया वहाँ,
मोहब्बत के सफर में उस गांव से गुज़रा हूं।
जिस नाव से करना था दरिया पार हमें,
लहरों से उलझती उस नाव से गुज़रा हूं।
वो चली गई, नहीं इसका गम मुझे,
वो आयेगी कभी इस आस में गुज़रा हूं।
रास्ते तो कई थे खुद को तबाह करने के,
तेरा मकां था जहाँ उसी राह से गुजरा हूं।
मुस्कुराता हूँ पूछते है जब वो हाल मेरा,
कैसे कहूँ किन हालात से गुज़रा हूं।
*इज़्तिरार : बेचैनी, restlessness


