सब फसें हैं, सब फसें हैं
हम भी फसें हैं, आप भी फसें हैं
इस चार दिवारी के बीच ना जाने कब से फसें हैं
इस बीमारी के बीच हिम सब फसें हैं, सब फसें हैं
लेकिन पहले क्या आजाद थे जज़्बात बोलने को
पहले क्या आजाद थे इस बड़ी सी साजिश के राज खोलने को
हम तब भी फसें थे, हम आज भी फसे हैं
हम चार दिवारी में नही ,जंजीर में बंधे हैं, एक जेल में बसें हैं
सब फसें हैं, सब फसें हैं
फसी तो वो भी है जो सुनसान सड़क पे थी आधी रात को
इन पुरुषवादियों से नहीं कह पा रही थी अपनी बात को
फसा तो वो नौजवान भी हैं जो रोज गंदगी में उतर रहा
अपने सपनो को खुद ही कुतर रहा
फसे तो वो बच्चे भी है जो अपने बचपन से दूर हैं
वो बच्चे जो इस सभ्यता की नूर हैं
फसे तो वो भी हैं जो असल आजादी मांग रहे
जो असल बिल्ली के गले में घंटी टांग रहे
फसी तो वो भी है जो मां, पत्नी , बेटी बन के रह गई
इस खोखले समाज के आदर्शों को चुप चाप सह गई
फसे तो वो भी हैं जिन्हें लगता है की वो फसें नहीं हैं
सत्ता में हैं तो वो हमेशा सही हैं
फसें तो वो भी हैं जो जात धर्म में बट रहे
नफरत की आरी से जो अंदर ही अंदर कट रहे
आखिर क्यों फसे हैं, आखिर क्यों फसे हैं
आप भी क्यों फसें हैं, हम भी क्यों फसे हैं
ये जान के भी बोल के लब आजाद है हमारे
एक चिंगारी हमारे पहले , एक आंधी बाद है हमारे
ये जान के भी की सच संग है हमारे
कुछ बदलने के लिए अंदर एक उमंग है हमारे
सोचिएगा क्यों फसे हैं , आखिर हम क्यों फसे हैं
आप भी क्यों फसे हैं , हम भी क्यों फसे हैं
