शुरू तो हमने स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक होने से किया था 

फिर किसी नेता की जनता बने, किसी सरकारी बाबू की गाली 

किसी मंत्री का वोट बैंक , किसी पूंजीपथी की ज़मीन, जिससे वो जब चाहे हमें बेदखल कर सकता हैं 

कभी अपने ऊपर वालों के हसी का पात्र बने , तो कभी अपने से नीचे वालों को दबाने वाले दुराचारी 

किसी के लिए सर्कस का शेर, चाबुक का डर हो जिसमें

जनतंत्र के जन थे, अब किसी के दांव का मोहरा बन गए 


पर अब हमारे हुज़ूर हमसे कुछ अलग चाहते हैं 

वो चाहते हैं की अब हम हिस्सों में कठपुतली ना बने 

बल्कि अब अपग्रेड हो रोबोट बन जाए 

और इस रोबोट की जो स्क्रिप्ट हो , वो ही पूरी रचे 

की हमारी थाली में क्या खाना हो, बदन पे क्या पहनावा हो 

हम क्या बोलें , क्या सोचे, नहीं ,सोचना ही तो नहीं हैं 

गर्दन झुकाए , जंजीरों में बंधे चलते रहे भीड़ में 

जागते हुए भी सोए , आदत डाल उनके तलवों की 

दूसरों के दुख से मुंह मोड़ ले , हर संवेदना से नाता तोड़ ले 

कलम से हमारी बस हुजूर की जी हुजूरी निकले ,ट्वीट करने को तिरक्थी उंगलियों से उनकी हर बात पर मंजूरी निकले

मजलूम की गुहार पे मौन रहना , हर प्रताड़ना को चुप चाप सहना 

पर हुजूर पे कालिख उड़े तो बड़क जाना, हर विरोध के खयाल से झगड़ जाना , ये गुड़ भरपूर हो हममें


अभी भी आपको अपने मोहल्ले में, चौराहों पर , पान की दुकानों पर , कुछ रोबोट मिल जाते होंगे 

लड़ते , झगड़ते, चिल्लाते, सामने वाले की बात को दबाते , 

आज वो वैसे हैं, कल को आप और हम होंगे , इस महान प्रजातंत्र की प्रजा , अपने राजा के लिए ।