हमें जन्म से
धर्म से
रंग से , जात से
नक्शे के हिसाब से
भाषा से, लिंग से
बिना किसी विचार के
बाट दिया गया हैं
पर कोई भूखा
किसी रंग का ,किसी ढंग का
किसी भी भाषा में
खाना मांगे
खा कर उसकी तृप्ति
एक सी होगी
सब की एक सी होगी
किसी की सत्ता की वासना
किसी की खोखली प्रार्थना
किसी की प्यास
को अलग नहीं बना देती
वो भी एक सी होगी
सबकी एक सी होगी
ये बटवारें असंख्य हैं
असंख्य हैं यातनाएं
तो असंख्य हैं
संवेदना का बीज बोती
क्रांति की आग जलाती कविताएं
