आंकड़ा
एक आंकड़ा बन गया आज इंसान भी
हर कलेक्टर, हर व्यापारी, देश का किसान भी
हर बड़े साहब के लिए हम बस वोट हैं
और जो विपक्ष में बैठे , तो एक जहरीली चोट हैं
जान की कीमत इतनी, की आंकड़ा बन गया मौत भी
हमारी जलती हुई चिता इनके लिए अगरबत्ती की ज्योत सी
हमारे जल ज़मीन जंगल की मांग हमसे ऊपर है
हम तो बस इन सरकारी कागजों के अक्षर है
टूटे परिवारों से जरूरी टूटे प्रोटोकाल है
मर रहे है लोग और इलेक्शन का बवाल है
इन ढेरो लाशों की एक अलग सी जो भीड़ है
हर सत्ताधारी की गायब ये जो रीड है
जरूरत के समय नेता बैठे पीछे वाले सीट पे
जनता दबी पाव तले , सत्ता बैठी पीठ पे
नदी में डूबोगे तो वो और नही डूबाएंगे
बस बगल में खड़े होकर वो तुम्हे नही बचाएंगे
फिर पूछेंगे अपना कसूर, कैसे हम ज़िम्मेदार है
हमारे काम देखो , हमारे ज्यादा बड़े इस्तेहार है
उन इस्तेहारों को देख हम सब भूल जायेंगे
सत्ता के झूले में वापस से झूल जायेंगे
फिर मर के आंकड़ा बन जायेगा हर बूढ़ा - नौजवान भी
हर डॉक्टर , हर इंजीनियर , देश का किसान भी


