दौर ए मुफलिसी का पल "खुशनुमा" नहीं होता !

"दर्द " के सिवा कोई "रहनुमा" नहीं होता !!


{तआकुब} "भूख" या "दर्द" के "आगोश"में !

"मुफलिसी" का कोई "खुदा" नहीं होता !!


 

"गुजर" रही है हर निशा "अश्कों" में साये में !

" बेदर्द-वक़्त" में " मुह " में अब " निवाला " नहीं होता !



" लिबास" ओढ़ रखा है " झूठी " " खुशी " का !

"देव " लिबास के अंदर मैं " खुशनुमां " नहीं होता !!


---देव एक शायर

कानपुर