
सांसो के अक्षय
बंधन में
बोझिल सांसें
आती जाती
पग -पग चलती
राह न पाती
अनजाने पथ में
खो जाती ।
प्रिय ! तुम तक कैसे मैं आती
सिसक -सिसक कर
मेरी पीड़ा
जब -जब अपनी
करुणा गाती
अपनी सुधि से
आधी -अधूरी
धूमिल सी
सुछवि बनाती
अविरल बहते
मेरे अश्रु
इक पल में ही
सब धो जाते ।
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