उसके माथे पर 

पसीना तक 

अखरता है 

मेरी आंखों में 

जिसकी 

शिकायतों की 

फेरहिस्त आज

मेरे हाथ लगी है ।

हमेशा की तरह

नसीब को कोस

फिर सोचा

आज बढ़

जाऊं आगे 

पर उसके

हाथों की

इन लकीरों

का क्या करूं

जो हमारी

आख़िरी मुलाकात

से मेरे हाथों 

पर छपी हैं ?


~ दीपशिखा (The Perpetual Inkpot)