बेटियां ,
मानो हो वो
पुराना सा
बरगद का पेड़,
जिसकी जड़ें
गहरी, बलवान,
बहुत अंदर
धरती के,
रहा करती हैं
पकड़े अपने
घर की मिट्टी
जिन्हें छेड़ने का
प्रयास कभी
नहीं फला
इस समाज को
क्योंकि प्यारा
है और नहीं कुछ
इस संसार में
पर केवल अपना
मिट्टी से जुड़ाव
बरगद को,
छेड़ना
चाहिए जिसे
तब भी नहीं,
जब फैला
रहा हो
अपनी छांव
वो एक और
दूजे आंगन
में उस मार्ग से
जो ' बिदाई '
कहलाता है ।
जड़ें, जो
माता - पिता,
परिवार, के प्रेम,
विश्वास और
संस्कारों के
गहरे पोषण
से गुंथी रहती
और रहती हैं
पकड़ अपने
आंगन की
मिट्टी को
कई करोड़
पलों को ।
बिदाई के
रूप में चाहिए
उस बरगद की
शाखाओं को
बढ़ने का
अवसर
जिस अवसर
को ' विवाह '
के नाम से
दिया जा
सकता है
अपनी
बेटियों को ।
ऐसी बिदाइयां
जो हुई तो
हुआ करेंगी
सिर्फ एक बार
और बनेंगे मकान
कम, घर अधिक,
रहेंगे पवित्र बंधन
जो तोड़ देते हैं
दम दिन
ढलते - ढलते
और नहीं
दम तोड़ेगा,
और न हीं
छोड़ेगा फैलाना
कोई बरगद
अपनी छांव
संसार में ।
