जैसे निहारते हो वृक्ष,मौसमें बहार कोजैसे व्याकुल हो धरती,बारिश की पहली फुहार को,जैसे तरसती हो आँखे,किसी के दीदार कोवैसे ही राह ताकती प्रियसी,प्रियतम के प्यार को।
जैसे निहारते हो वृक्ष,मौसमें बहार को
जैसे व्याकुल हो धरती,बारिश की पहली फुहार को,
जैसे तरसती हो आँखे,किसी के दीदार को
वैसे ही राह ताकती प्रियसी,प्रियतम के प्यार को।