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किताबें


पढ़ते पढ़ते सिखा मैंने,किताबों का ककहरा,

ज़माने की रिहायशी में खोये हैं सब यहाँ,मैंने ख़ुद को किताबों में खोया है।

सच की राह लिए मन में,एक काश की उम्मीद पायी है,

राहतों की चाह लिए अंदर,फ़िर सिर्फ़ ख़ुद को ही चाहा है।।

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