ढंग -ढंग के रंग साज से

श्रृंगार करे होली बाला का

अहले मारू कलम पिचकारी

मारू गुब्बारा शब्द-ए-स्याही

नीली होय हर पीली बाला

पढ़-पढ़ मुग्ध होय मतवाला

शब्द भरे भांग घट में

पिलाए रंगी नीली बाला

बांटत न घटे घट न मद घटे

बढत चाहे जितने प्याला

नैनो से भांग पिलायी

धोखे से तन मन रंग डाला

जितने धोए उतने रंगे

उसने पनघट रंग डाला

पलक न झपकी ऐसे झूमे

ऐसी लय साज बजाए बाला

ढंग-ढंग के रंग साज से

हाय! ऐसी रंगी कविशाला।