घर
क्या कहू इस आँगन को
एक ज़मीन का टुकड़ा
जो बाउजी को बटवारे के वक़त मिला
जिसने हमारे साथ भी वही तूफानों का सामना करा
जो हम लाहौर से विरासत मे थे
जिसकी मिट्टी में वही खून हैं
जो मेरे लड़खड़ाते कदमो से गिरते वक़त
मेरी रगो से बहा
जो बाउजी की रगो में हैं
ऐसा रिश्ता ईटो और मिट्टी से तो नहीं हो सकता
या फिर घर उसमे रहने वाले परिवार से बनता है ?
पर फिर क्या परिवार खून के रिश्तो से बनता है ?
ये किसने तय किया के घर में अजनबी नहीं रह सकते ?
वो भी एक ज़माना था जब इमरजेंसी के दौरान हमारे
जैसे लोगो ने हज़ारो सीखो को अपने बसरे का हिस्सा बनाया था
और आज भी मैं शाहीन बाग के बसरे में
तस्लीमा आपा के साथ रह के आयी हूँ
आज के घरों में अम्बुजा सीमेंट है , ऊंची दीवारे है
शायद इसीलिए बाहर की दुनिया की परख नहीं हो पाती
मदद की गुहारे बवंडर सा शोर लगती है
आंसू पब्लिसिटी स्टंट लगते है
और झूठ तो चिटा सफ़ेद हो गया है
घर आजकल व्हाट्सप्प पर बनते हैं
शायद इसीलिय आंसू पोचने के
स्पर्श को भूल गए है
घर को ना तो दीवारों की ज़रूरत है
ना ही आपनो की
घर हर उस पल बनता ता और बढ़ता है
जब हम निस्वार्थ हो
दुसरो के लिए कुछ करते है
अब वो बेगाने हो तो क्या
पहला रिश्ता जो हमारा किसी और के साथ
भगवान की देंन है
वो हमेशा ये रहेगा की
हम दोनों इंसान हैं
एक ही मिटटी
एक ही विधाता की रचना
