काका की छोटी सी दुकान पर

रखी कांच की बर्नी में बचपन

के रंग बिरंगे किस्से आज भी कैद पड़े हैं


गलियों में भागता बचपन

गिरकर भी मुस्कान लिए खड़ा है

देखो वो नुक्कड पर फेरीवाला

यादो के गुब्बारे लिए खड़ा है


सुबह स्कूल तक की दौड़ में

भीड़ का हिस्सा हो जाया करते थे

कक्षा जो मंजिल हुआ करती थी

वहां तक जाने के लिए

बाबा की उंगली छोड़ आया करते थे


गर्म दोपहरी में किलकारियों का जमावड़ा

चौपाटी पर धूम मचाया करता था

रात बत्ती गुल होते ही

आइस्क्रीम वाले तक दौड़ लगाया करता था


बचपन के बस्ते में

वो खेल खिलौने, वो गुड़िया छुपा रखी है

पहले जन्मदिन पर पहनी पिंक फ्रोक

आज भी बक्से में सजा रखी है


बारिश के मौसम में वो

टीन की छत पर बजती धुन पर भी नाच आए हैं

उम्र के मोड़ पर वो

बचपन का दौर छोड़ आए हैं