मैं तो सीधी साधी बाते किया करता था पर ख़ामोशी के बोझ तले बातो मैं कुछ सलवटे पढ़ गयी है और लोग कहते है जनाब शायर हो गए कुछ कोमल ख्याल मर गए कुछ कोयले से कीमती हो गए कुछ बाते करीब आ गयी , और हामला* हो गयी , नए नन्हे मानी उग आये उन पे | ख़ामोशी के खोल तले बड़ी धमा चौकड़ी मचाते है मासी मासी कहते ख़ामोशी को , ख़ामोशी भी न सताती न जताती , बस एक अल्हड बाप सी सिर्फ आँखे दिखाती जानती थी वोह बड़ा मुश्किल है सफर मानी से मकसद का पर इन दिनों बैचनी कर रही है साजिश भड़का रही है मानी को ग़र यही सब चलता रहा टूट जाएगी ख़ामोशी एक दिन और खोज लेंगे मानी भी अपना मक़सद तब शायद मुकम्मल होगा शायर भी. *हमला = गर्भ से