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तरूण आकर्षण

यूं विषम समय तुम झलक दिखा, तन में सिहरन भर जाते हो

हमें समय-2 विचलित करके, तुम पता नहीं क्या पाते हो I


मैं कितना बेचारा हूं, उस विचलन में दब जाता हूं

सत्य कथन है नहीं है वो पल, तुमसे बिछड़ जब जाता हूं I


इक सतत श्रंखला थी जीवन में, अब शून्य उभर सा आया है

इस रिक्त स्थान की पूर्ति का,व्यंजक बस तुममें पाया है I


वो व्यंजक मुझको तुम दे दो, कितना अद्भुत एहसास जगे

फिर मृत्युलोक के ग़मों में भ, आनंद का अनुभव खास लगे I


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