मेरी कलम बुढ़िया है सौ साल से ज्यादा की पर जुबान और अक्ल आज भी वैसी ही ढ़क है रिक्शे के पिछले पहिए जैसी उतर जाती है चेन बार-बार और मैं एक सलाईरिंच तलाशता हूं ताकि इसे एक बार दुरुस्त कर सकूं पर मेरी कलम बुढ़िया है पेट-मुँह से गई हूई सौ साल से भी ज्यादा की। ___ यात्री