धीरे-धीरे ,
सीढ़ी-दर-सीढ़ी
बूँद-बूँद कर के ही
भरेगा घड़ा ,
पैरों के छाले ही बताएँगे
सफ़र की सच्चाई ,
क्योंकि
सोचना और हो जाना
बैठे रहना पहुँच जाना
होता है केवल
किताबों में ही ,
और देखा जाए तो
उनमे भी कहीं-कहीं I
रास्ता होना होगा
मंज़िल होने के लिए ,
क्योंकि
गहराई कितनी है
कितना सामर्थ्य है
होगा तभी मालूम
जब मापेगा समय हमको
क़दम-दर-क़दम I
शुरुआत तो ऐसे ही होगी ,
होनी भी चाहिए...


