मौन हो जाना कितना सटीक होता है 

न दुःख में अश्रु , न सुख में मुस्कान जैसे खींच दी गई हो एक सीधी लकीर समतल धरातल पर…. जिसके इस ओर उस ओर तमाम संवेदनाएँ फिर खड़ा हो जाया जाए लकीर पर न एक इंच इधर न एक इंच उधर बीचोबीच , बिना हिले डुले I

मौन....