मैं और मेरे स्वप्न...

इतर कुछ और कहा था मेरा लेकिन , जो दुनिया सोची है मैंने जिसे देखा है खुली-बंद आँखों से जैसे-जैसे सोचता हूँ सब दीख पड़ता है सच भले स्वप्न में ही... सुखद है स्वप्न में खोये रहना वास्तविकता जो भी हो हो , मुझे क्या I

मुझे तो लगता है है यथार्थ भी स्वप्न , किसी का यथार्थ किसी के लिये स्वप्न जिसका स्वप्न है वो दृष्टा , कर्ता-धर्ता , मालिक और जो जी रहा है उसके अनुरूप इशारों पर नाचती कठपुतली सा वो है उस स्वप्न का यथार्थ I

मैं भी चाहता हूँ स्वप्न में जीना किन्तु न बनना और न बनना चाहता हूँ कठपुतली , न ही न्यायाधीश जैसा बैठने का इक्षुक ही न पाप-पुण्य का लेखा जोखा रखने वाला क्योंकि मैं जनता हूँ जब स्वप्न मेरा है तो पाप भी मेरा होगा पुण्य भी मेरा होगा I

मैं रहना चाहता हूँ स्वप्न में मेरे स्वप्न-निर्वाहकों का सहयोगी बनकर कि जब ह्रदय में उमड़ें विलाप के बादल तो केवल वे न रोयें , मैं भी रोऊँ साथ उन्हीं स्वप्न-निर्वाहकों के I

मैं चाहता हूँ स्वप्न मेरा हो किन्तु , मैं रहना चाहता हूँ निर्वाहकों के बीच स्थूल होकर न कि सूक्ष्म , खेलना-कूदना , हास्य-विनोद सब कुछ किन्तु साथ , मिल जुलकर प्रत्यक्ष I

नहीं रहना चाहता बनकर प्रश्न कौतुहल का विषय अपनी सत्ता का आभास नहीं कराना चाहता जीना चाहता हूँ अपनी ही सत्ता में , भोगना चाहता हूँ हर सुख हर दुःख उन्हीं के साथ-साथ जो निभा रहे हैं मेरे स्वप्न को मेरे प्रिय स्वप्न-निर्वाहक I

मैं और मेरे स्वप्न...