एक ख्वाब ने दस्तक दी
एक सपने ने पहचाना उसे
वो ख्वाब कुछ सच सा था
कुछ बेचैन, अधीर सा था
शायद वो... याद सा था?
नया नहीं, पहले हुआ सा था
रह गया था किसी कोने में
जो था भी और नहीं भी था
फिर आया नज़र एक झलक सा
देने प्रमाण अपने अस्तित्व का
और खो गया फिर से किसी कोने में
वो बेचैन ख्वाब, कुछ अधीर सा...
