सारा दिन अकेलापन महसूस होता है
थक कर जब भी घर जाता हूं
मेरा घर मुझको खाने को आता है
दिया बुझा के जब भी सोना चाहता हूं
तेरी यादों का मेला लग जाता है
मुझे अंधेरे में रहना आता है
ना जाने कौन दिया जला जाता है
वो रोशनदान भी थक गया
तेरे इंतजार के इंतिहान से
जो कभी रोशन रहता था
तेरे चांद जैसे दीदार से....
दीपक (बेख्याली)


