जो पलट कर नहीं देखा किसी ने
वो श्रृंगार किस काम का
जो भेद नहीं सका दिल किसी का
वो आंखों का सुरमा किस काम का
जो बन नहीं पाया फंदा किसी के गले का
वो जुल्फों का मायाजाल किस काम का
वो लबों की लाली किस काम की
जो जान ना ले ले किसी खास की
तुम बोलती हो जान ले लोगी मेरी
क्या यह काफी नहीं है
जो तुम्हारी,मुझसे ढाई गज की दूरी है
कत्ल सिर्फ चाकू से ही हो क्या यही जरूरी है...
दीपक (बेख्याली)


