जंहा हिमालय भी सर को झुकाता हैवो मोक्ष का द्वार हूं मैंहा हरिद्वार हूं मैंहरि के निवास से लेकरमानुष के अंतिम सफ़र का द्वार हूँ मैंहा हरिद्वार हूं मैंदीपक (बेख्याली)
जंहा हिमालय भी सर को झुकाता हैवो मोक्ष का द्वार हूं मैंहा हरिद्वार हूं मैंहरि के निवास से लेकरमानुष के अंतिम सफ़र का द्वार हूँ मैंहा हरिद्वार हूं मैं
दीपक (बेख्याली)