चल, अब लोट चलु अपनी बस्ती मेंबहुत कुछ खो दिया आगे बढ़ने की हस्ति मेंखाली मन का भार अब न उठाया जाता हैपीछे मुड़कर देखा जब भीहमेशा खुद को अकेला पाया है!दीपक (बेख्याली)
चल, अब लोट चलु अपनी बस्ती मेंबहुत कुछ खो दिया आगे बढ़ने की हस्ति मेंखाली मन का भार अब न उठाया जाता हैपीछे मुड़कर देखा जब भीहमेशा खुद को अकेला पाया है!
दीपक (बेख्याली)