बेजान जिंदगी...
जिंदगी रुक सी गई है
वर्षो से
किसी तिराहें पर लगे पुतले की तरह
जैसे जकड़ी हो किन्ही जंज़ीरों में
बँधी हो किसी तिलिस्म में
बेबस और बेजान
जो वर्षो से धूप में तप रही है
बारिश में भीग रही है
अँधेरे में डर रही है
लेकिन सूरज की पहली किरण के साथ
हमेशा
खिलखिला उठती है जिंदगी
कुछ पलों के लिए
सूरज को कह दो
कि आ जाए धरा पर
ले ले मुझे अपने आगोश में
पिघला दे मुझे एक बार में
या कह दो चाँद से
कि आ कर जमीं पर
कर दे मुझे अमर
अपनी चांदनी से..
यूँ हर रोज़ बार-बार
मरते-जिन्दा होते
थक गया हूँ मैं
उतरती जा रही है
करके एक-एक परत
हो गया हूँ कमज़ोर
नहीं बची अब हिम्मत मुझमे
बिखर जाऊंगा मैं किसी दिन
यूँ ही
मिल जाऊंगा इस मिटटी में
न बच पाऊंगा मैं
न बच पायेगा मेरा वजूद।