वह जिंदगी थी
बहुत ख़ूबसूरत
चेहरे पर उसके भोलापन
फिर भी
उसके भोलेपन में उदासियाँ सी थी
था उसे किसी का इंतज़ार
शायद
जब आईनें के सामने आई जिंदगी
अपने भोलेपन पर शर्मिंदा थी
उस चहरे को छोड़कर
आईने में दाख़िल हो गया भोलापन
चुपचाप
बच गया केवल एक खूबसूरत चेहरा
जो ढूंढ रहा है एक दूसरा नकाब
आईने में दाख़िल होता भोलापन
जा चुका हैं बहुत दूर
तमाम स्मृतियों के साथ
भोलेपन का आइने में दाखिल हो जाना
कोई नई घटना न थी जिंदगी के लिए
भोलेपन के जाते ही
सिर उठाने लगे अनेकों नए नकाब
शायद कल फिर दौड़ेगी जिंदगी
उसी आईने की ओर
एक नए चेहरे के साथ
एक नए चेहरे के लिए . . . . .