प्रेम गुलाबों की ख़ुशबू नहीं,दशरथ मांझी का हथौड़ा है,कर्ण का दान है,शबरी का इंतज़ार है,मीरा का विरह है।जो इन्हें समझ ले,उसे प्रेम समझाने की ज़रूरत नहीं रहती।
प्रेम गुलाबों की ख़ुशबू नहीं,दशरथ मांझी का हथौड़ा है,कर्ण का दान है,शबरी का इंतज़ार है,मीरा का विरह है।
जो इन्हें समझ ले,उसे प्रेम समझाने की ज़रूरत नहीं रहती।