कभी कभी मैं मकड़ी सा
जब बुन रहा होता हूँ शब्दों के जाल
तभी मन में टकरा जाते हैं
कुछ खुद से अधूरी शिकायतें मेरी
और फंसा सा रह जाता हूँ मैं ...
खुद के ही बनाये जाल में


कभी कभी मैं मकड़ी सा
जब बुन रहा होता हूँ शब्दों के जाल
तभी मन में टकरा जाते हैं
कुछ खुद से अधूरी शिकायतें मेरी
और फंसा सा रह जाता हूँ मैं ...
खुद के ही बनाये जाल में