उठती कलम उड़ जाने कोछूती हुई पन्नों के सागर को

काटती उसकी छाती

निकल आते शब्द उसकी गहराई से

और इस कदर पीछा करते कलम का

जैसे घुल जायें उसकी स्याही में

और उकर आयें पन्नों पर जीवन बनकर /


उठती कलम तैर जाने को

उसी सागर की सतह पर

जिसका कोई छोर ना हो

और उसकी सतह पर तैरते शब्द

चल पड़ें कलम के साथबनायें ऐसा प्रवाह

और उस प्रवाह की तीव्रता में

उकर आयें पन्नों पर जीवन बनकर /


उठती कलम चढ़ जाने को उस सागर से लगे पर्वत पर

और बैठ जायें उसके मस्तक पर

सागर की नमीं में लिपटे शब्द

पकड़ लें उंगली हवा की ओर दौड़ जायें कलम की ओर कुलमुलाहट से

अपने पैरों की सुन्दर आकृति से

उकर आयें पन्नों पर जीवन बनकर /


उठती कलम दौड़ जाने कोउसी सागर के किनारे पर

छूती सागर के पैरों को

और सागर की लहरों में बहकर आए शब्द

रुक जाते कलम को देख और झुक जाते

 उकर आने को पन्नों पर जीवन बनकर /


और लौट जाता सागर अकेला

बिना शब्दों के

इसी तरह सदियों से शांत, अकेला

ना किसी से प्रश्न ना वज़हऔर फिर से जन्म देता

अपनी गहराई की कोख से

नये शब्दों को

कि कोई उठती कलम

ले जाये उसकी कोख से निकले ,

उसकी गोद में पले शब्दों को

और उन्हें दे एक सुनहरा जीवन

अब देख रहा

उठती कलम //


                                                 

                            दीपक कुमार प्रजापत