मेरे लिए इस ठिठुरती ठंड की धूप हो तुम,

चला जाए न जाए पर सुबह की सैर हो तुम,

पाना चाहू तुम्हे लेकिन नींद की ख़्वाब हो तुम,

वो पहाड़ी हो तुम,

शाम के वक्त बादलों से छटते किरण हो तुम,

बारिश के बाद मिट्टी की सुगंध हो तुम,

पहली बार हाथ पकड़ने की कंपन हो तुम,

गूंगे के कोशिश करने के बाद निकली आवाज़ हो तुम,

किसी अंधे की दिव्यदृष्टि हो तुम,

सृष्टि हो तुम,

लब हो तुम,

कब हो तुम,

जब हो तुम,

अब हो तुम,

सब हो तुम!


                   Deep Jhha