श्याम एक मज़दूर था, ये 'था' इसलिए कि शायद वो दुबारा अपने गाँव जा किसान बन जाए, लॉकडाउन मैं फैक्ट्री बंद हो जाने के कारण अपने पत्नी रुक्मणी और अपने बेटे कृष्ण के साथ पैदल ही निकल पड़ा, दोनों मज़बूरी में चल रहे थे, और कृष्ण गाँव के लीला पाने को, अपने पड़ोस में उस सफेद मेमने के साथ खेलने को, माँ बाप से आगे आगे चल रहा था, इस बात से बेख़बर की अब मेमना बकरा बन चुका होगा, कही बिक भी नहीं गया हो, वैसे एक लीला और भी थी इनके साथ रुक्मणी के पेट मे तीन महीने का बच्चा, अब लीला हैं क्यों? जनाब क्योंकि ये ग़रीब हैं लेकिन निर्दय नहीं, कृष्ण को बहन चाहिए उसने पहले ही इसका नाम लीला रख दिया हैं, थकते बैठते मज़दूर किसानी की तरफ बढ़ रहा था और बच्चा मेमने के, जहाँ भी रुक्मणी कहती श्याम वहीं रुक जाता, रुक्मणी चलने में असमर्थ हो रही थी और श्याम हार मानने को तैयार न था, जिस हथोड़े और कील से शहर में वो आलीशान फर्नीचर बना रहा था उससे लकड़ी की गाड़ी बनाने लगा और बना भी दिया, कृष्ण के लिए ये सफ़र जैसे आनन्द से भरा था जहाँ मन उतर सकता था,बाहर देख सकता था, श्याम लकड़ी के गाड़ी को खीचते हुए गाँव पहुँच गया, श्याम अपने घर से मिल रहा था, अपना कुदाल ढूंढ रहा था, रुक्मणी जल्दी से लोटा ढूंढ चापाकल से ठंडा पानी लाने जा रही थीं, और कृष्ण अपने मेमने से मिलने, और लीला, ये लीला आराम से गर्भ से देख रही थी।