है कौन सा अस्नाफ़ कुछ समझ नहीं आता
ये दिल कमबख़्त खुद पे काबू रख़ नहीं पाता
हर रोज़ बुनता है नए ख्वाब की चादर पे कुछ
उलझाकर उसी में फिर वो सुलझ नहीं पाता
एक बार का किस्सा यूं के किसी ने तोड़ दिया
अगर दूसरा न मिलता तो ये संभल नहीं पाता
दरकिनार की हैं उदासियां तेरे शहर में आकर
फिर भी तेरे शहर का मौसम मुझे नहीं भाता
दास्तां ए दस्तूर है, इल्म ने कहा है, मुंह खोलो
परिंदा है, उड़ता है, मगर वही बोल नहीं पाता
