जो खुद इस धरा के जैसी हैं,
वो खुद ही धरा पर चल रही हैं।
धूप चढ़ गई हैं जिंदगी के सर पे,
माँ रह रह के पट्टी बदल रही हैं।
बच्चों के लिए ख़्वाब होती हैं माँ,
हर सवाल का जवाब होती हैं माँ।
हमारे कांटो भरे जीवन के वन में,
खिलता हुआ गुलाब होती हैं माँ।
हमको देकर के छांव का आंचल,
वो ख़ुद धूप में जल रही हैं।
धूप चढ़ गई हैं जिंदगी के सर पे,
माँ रह रह के पट्टी बदल रही हैं।
-DEEPAKMSTBAJI
