अब किस डगर को जाऊँ मैं

कि मंजिलें धुँआ-धुँआ

चलूँ रुकूं रुकूं चलूँ

कि खोया खोया कारवाँ


"क्या सही है क्या गलत

क्या लिखा हथेली पर

तमाम से सवाल पर

मैं लड़ रहा हूँ रात भर"


कुछ बोल भी ना पाऊं मै

ये मैंने ही तो क्या किया?

क्यूँ समझ ना पाउँ मैं

इस ज़िन्दगी का फलसफा


"सिमट रहा है वक्त यूँ

कुछ हाथों से फ़िसल रहा

वो बर्फ जैसा पानी ही था

जो जमते ही पिघल गया"


मैं चल रहा हूँ इक तरफ

मैं चल रहा कहाँ-कहाँ 

धुआँ रुके तो आँख नम

मैं छुप रहा जहाँ-तहाँ 

डगर मेरी सफर मेरा

मगर भटक रहा यहाँ वहाँ

मैं भटक रहा यहाँ वहाँ


✍️दीक्षा