में शिकस्ता हो गया हूँ आज के हालात से रस्सी ढीली पड़ती जाती है मेरे भी हाथ से में उसूलों के क़िले में क़ैद होकर रह गया मेरा अब न धूप से रिश्ता है न बरसात से यूँ गरज़ वालों की दुनिया में अकेला पड़ गया मेरे अपने खेलते हैं अब मेरे जज़्बात से बेवफाई का ज़िकर खुद ही ग़ज़ल में आ गया गुफ्तुगू हमने शुरू की थी तुम्हारी बात से मैं खिलोने छोड़कर पन्ने पलटता रह गया वक़्त हसीं लम्हे चुराकर ले गया हयात से