जिसे गिर के उठना गंवारा नहीं है
उसे ज़िन्दगी ने संवारा नहीं है
मुझे उसकी आवाज़ क्यों आ रही है
मुझे जब की उसने पुकारा नहीं है
उसे क्या खबर कितना नादान है वो
हमें कह रहा है हमारा नहीं है
ज़रा तू पशेमान हो कर चली आ
अभी तुझको दिल से उतारा नहीं है
अजब तीरगी है की जुगनू तो छोड़ो
फलक पे भी कोई सितारा नहीं है
वाक़िफ़ हूँ फिर भी सफर में हूँ 'दानिश'
सागर का मेरे किनारा नहीं है