आँखों से क़त्ल होकर बदनाम हो गया है
मक़तूल पे ही सारा इलज़ाम हो गया है
उसने ही ज़िन्दगी में पाईं है सब बुलंदी
इस आशिकी में जो भी नाकाम हो गया है
मेरी दुआ थी या रब हर कोई इश्क़ चक्खे
अब लग रहा है मेरा भी काम हो गया है
तुझको कहाँ खबर थी बन जाएगी ये रेहमत
बदनाम करने वाले, मेरा नाम हो गया है
दर्द-ए -जिगर बढ़ा तो आँखों में आ गया था
अब शेर लिख रहा हूँ आराम हो गया है
उसने निगाहें वेह्शत जो डाल दी है ‘दानिश’
मैं पी रहा था पानी अब जाम हो गया है