जाने किन उलझनों में खोयी हो
इतना हंसती है जैसे रोई हो
नींद आँखों में ऐसे जागी है
जैसे बरसो से वो न सोई हो
बाद मुद्दत ये कैसी दस्तक है
दिल ये कहता है और कोई हो
रो के सब वर्क भर दिए जैसे
आंसुओ में ग़ज़ल पिरोयी हो
खुद में वो शख्स कब मिलेगा मुझे
जिसके लहजे में साफगोई हो
शेर खिलके कोई महक जाएँ
काश ऐसी ग़ज़ल भी बोई हो