देखो किस ऊंचाई पर है आज हमारी कविशाला।
अभी तो मंज़िल दूर है यारो ये तो एक अध्याय है।
समय पे ही सब कुछ होता है इसका अपना न्याय है।
कुछ करने की अलख जगी है हर दिल में है एक ज्वाला।
देखो किस ऊंचाई पर है आज हमारी कविशाला।
दिल की बात ज़ुबाँ तक आये और क़लम तहरीर करे।
दबी ज़ुबाँ में छुपके जैसे बात कोई तस्वीर करे।
अपनी क़लम हो साक़ी जैसे और ग़ज़ल मय का प्याला।
देखो किस ऊंचाई पर है आज हमारी कविशाला।
अपने दिल में बातें रखके दौर नही चुप रहने का।
हमको एक आधार मिला है अपनी बात को कहने का।
खुद से बाहर आकर देखो खोल दो इस दिल का ताला।
देखो किस ऊंचाई पर है आज हमारी कविशाला।
अपने ख्वाव की परियो को तुम पंख लगाकर उड़ने दो।
आओ हाथ से हाथ मिलाओ कड़ी कड़ी से जुड़ने दो।
जो आएगा इस बस्ती में हो जाएगा मतवाला।
देखो किस ऊंचाई पर है आज हमारी कविशाला।