बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं है;
सच में क्या कुछ दिखा नहीं है,
या नव उष्मा से वंचित हुँ मैं;
क्या नवप्रभात ने छुआ नहीं है,
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संशय है कुछ मन के भीतर;
या मुक्त - आंदोलित - अह्लादित है सब,
प्रश्न भैरवी बन जीवन से; पुछती किंचित स्वर माधुर्य सी,
ये बतलाओ पथिक तुम पहले
खुद से आगे जो राह तुम्हारी...क्या उस पर पहले कोई चला नहीं है ?
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या तुम हो नदियों की वो धारा; मिलतीं आखिर एक जगह सब,
पर आरंभ से कोई मिला नहीं है; आरंभ से कोई मिला नहीं है।
©DaminiQuote
©दामिनी नारायण सिंह

