हे अनुज सुन धैर्य शौर्य का प्रवाहित हाँ जग जहाँ है

परिभ्रमण में मार्ग जो बाधित देख तो अवरोध कहाँ है


कह घटा से जम के बरसे व्याकुल जब हाँ प्राण जहाँ है

विदित समय को भान हो आखिर पथ में विराम कहाँ है


हे अनुज तुं गढ़ सुदर्शन चक्र में जब जहाँ प्राण नहीं है

परिभाषित कर ले तुं जीवन भरतवंश का मान यही है


चमक शीश पर चंद्र की भाँति शिव धरा का प्रमाण यही है

सिंहासन को हाँ वन मिले जब रच रामायण शान यही है


बालपन जब कतरन में भींगे टेंट में प्रभु न्याय को तरसे

पुरुषार्थ को विश्राम कहाँ है सृजन में जब सामार्थ्य जहाँ है


हे अनुज.......चल उस एक पथ पर ...!

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दामिनी नारायण सिंह