जब आप हमें हिम्मत देते हैं

       खुद को लिखने की,

        तो हमें हिम्मत करनी होगी आपको पढ़ने की,


हमें जिक्र करना होगा आपके रास्तों का

हमें विस्तार ढुंढना होगा आपके आदर्शों में


हमें निश्चलता देखनी होगी आपकी मुस्कुराहट में


हमें कोशिश करनी होगी जानने की


आखिर समंदर के किनारे असीमित रेत की लयबद्ध श्रृखंला में शामिल कण मात्र सा आपका बचपन

कैसे चला उथ पथ पर


जहाँ आदिकाल से कोई चलता रहा है तो बस

आरंभ लिखने को बाध्य ऋषि परंपरा

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"कलाम किसी कलमा से कम नहीं"


©दामिनी नारायण सिंह