वो तीन नन्हीं पत्तियाँ

जो न जाने कबसे जुड़ी रहती हैं

एक पतली नन्हीं सी लकीर के सहारे

रोज भिंगती हैं; अपने पत्तों पर ले ओस की बुंदें

इंतज़ार की लंबी खेप और तैयार करती हैं खुद को

        "सावन के उस पहले दिन के लिये"

जब न जाने कितनी हथेलियों से होकर गुजरेंगी वो

हर कोई संभालेगा ऐसे जैसे श्रद्धा से भर गया हो

और आचमन के लिये तैयार

आखिरी बार बेल के वृक्ष से अलग हो रही वो पत्तियां जैसे कह उठी हों

       उदास मत होना ऐ बेल वृक्ष

सदियों से हमारे अवतरण का एक ही तो ध्येय है

जैसे हम अंश हों; कभी न मिटने वाले अखंडित

        शिव पार्वती और गणेश के

हम तीन पत्तियां इंतज़ार करती हैं; उस एक मास श्रावण का

जब खुद महादेव देते हैं हमें

                  "अधिकार श्रृंगार का"

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©दामिनी नारायण सिंह