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आज का चाँद


देखो न ये धुली सी शामगगन से लिपटा कैसे चाँद

शोर नहीं आजूबाजूतारे का वो अल्पविराम

मंद-मंद मुस्काता चंदापर्वत जैसे हो आसान

मनुहारी जग पावन साकह रहा है आज का चाँद©️?

— दामिनी नारायण सिंह
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