एक अपनों के मोह में बंधी निभा रही है सब रस्मों को

कोमल हृदय कोमल देह है निभा रही है सब कसमों को


पैदा करती जननी है वो, पालती है वो ,है माली भी

धिक्कार उस समाज पर मुझे औरत पर बनाते गाली जो


प्रेम उसे तुम दे ना सको तो, ना देना उसे दुख दर्द कभी

पूजा नहीं चाहती अपनी वो पर कद्र तो करो औरत की सभी


9 माह तक कोख में रख कर जन्म देती है संतो और राजाओं को

सुना है मैंने ग्रन्थों में भी अपवित्र लिखा है औरत को


अफसोस मुझे उस आदमी पर जो मां की विशालता ना जान सका

अफसोस मुझे उस आदमी पर जो औरत को पहचान ना सका


उसी रब की रचना है औरत भी

जिस रब ने पैदा किया आदमी को

जो दर्जा है आदमी का वोही ही दर्जा मिले बस औरत को

दिल की चाहत आदमी के समान हक मिले बस औरत को

Dalpreet Singh DSK