“सच्चा सुख”
पेड़ से गिरते पत्ते की तरह
कोई मुझे गिरा दे तो दुःख नहीं,
आकाश में चमकते सितारे सा
कोई मुझे ऊँचा उठा दे दो सुख नहीं
दुखो से न दिल टूटेगा,
खुशियों से न आशा बांध पाएगी
ये लड़ाई ये झगडे ये रोष ये बैर
क्यों पालते हो ये सब यह जानते हुए
की एक दिन ये आत्मा अकेली चलीजायेगी,
इसी तरह विनाश की और बढ़ता रहा ये संसार,
लोग ये आग धुए का खेल खेलते रहे,
करते रहे एक दूजे का संहार,
तो एक दिन ये घर खाली हो जायेगी,
इंसान इस धरती के लिए पहेली बन जाएगा,
अगर हर तरह शांति कायम हो पाएगी,
तभी इंसान को सुख की, सच्ची अनुभूति हो पाएगी


