एक बहती नदी दिखी,

और दिखी उसकी द्रुत जल-धारा,

उसमें एक ओछा तिनका,

बह रहा था बिन कोई सहारा,

कभी टूटी उसकी हिम्मत,

तो कभी वो तिनका बेचारा,

पथ की अड़चनें भी बढ़ती रही,

उसका दर्द था आवारा,

खंड-खंड होकर भी वो,

बहता चला यत्र-तत्र पथ सारा,

पर डूबा न पाया उसे,

ये जल-प्रवाह,हाँ ! वो नहीं हारा !! —चंद्र शेखर तिवारी