कैसा असंवेदनशील सा हो रहा है जग,
कैसे सुन्न से बन रहे हैं लोग,
ये कैसी दुनिया है, जाने किस सांचे में ढाल रहे हैं लोग,
ना ग़ैरों के लिए संवेदना है दिल में,
ना अपनों के लिए प्यार,
मर रही है मानवता या जाग रहा है पिशाच,
हर तरफ़ तो बस भावहिन पूतले हैं,
किसी के दुःख तक़लीफों से किसी को मतलब नहीं यहां,
गुम सी है इन्सानीयत, ना जाने इन्सान हैं कहां,
ना जाने ये किस प्रगती-पथ पर अग्रसर हैं हम,
अपरिपक्व सा मन और असहिष्णु से भाव लिए,
आगे ही आगे चल रहे हैं लोग,
ना अपनों के लिए प्यार, ना ग़ैरों के लिए संवेदना,
ना जाने किस सांचे में ढल रहे हैं लोग ।।।
\\चंचल शर्मा\\


