उस सुंदर वन के पेड़ के नीचे
अब वो चिड़िया न गायेगी
हम भी सोएंगे वही मगर
वो आवाज़ न हमें जगाएगी
तुम थे किसी के पहचाने पर
हमारे शील के परवाने थी,
धीर, दृष्टि, धैर्य चकितमय
ये कैसी मिन्नत जाने थी?
संवेदन मन की व्यथा
ये बोलीं कहाँ तक जाएगी
हृदय की धुन तो सुन रहा हूं
पर वो आवाज़ कभी ना आयेगी
मुक्त हुई चंचल जग से
शेष अभी था काल प्रिये
अधिजन व्याकुल, जीवन व्याकुल
ये कटु धीर पर धार प्रिये
अब जग जगा कर क्या करें
जब तुमने अधर छिपा लिया
दृष्टिहीन दुनिया हो गई
जब स्वयं को ज्योतिर्मय बना लिया
- Crinctum

